Saturday, July 25, 2020

26 जुलाई : ज़रा याद करो रण बाँकुरो की कुर्बानी

कारगिल विजय दिवस

हर साल कारगिल युद्ध के नायकों के सम्मान में 26 जुलाई मनाया जाता :




कारगिल विजय दिवस स्वतंत्र भारत के सभी देशवासियों के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण दिवस है। भारत में प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई के दिन यह मनाया जाता है। भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध लगभग 60 दिनों तक चला और 26 जुलाई के दिन उसका अंत हुआ और इसमें भारत विजय हुआ। कारगिल विजय दिवस युद्ध में शहीद हुए भारतीय जवानों के सम्मान हेतु मनाया जाता है।[1]

1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद भी कई सैन्य संघर्ष होता रहा। दोनों देशों द्वारा परमाणु परीक्षण के कारण तनाव और बढ़ गया था। स्थिति को शांत करने के लिए दोनों देशों ने फरवरी 1999 में लाहौर में घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए। जिसमें कश्मीर मुद्दे को द्विपक्षीय वार्ता द्वारा शांतिपूर्ण ढंग से हल करने का वादा किया गया था। लेकिन पाकिस्तान ने अपने सैनिकों और अर्ध-सैनिक बलों को छिपाकर नियंत्रण रेखा के पार भेजने लगा और इस घुसपैठ का नाम "ऑपरेशन बद्र" रखा था। इसका मुख्य उद्देश्य कश्मीर और लद्दाख के बीच की कड़ी को तोड़ना और भारतीय सेना को सियाचिन ग्लेशियर से हटाना था। पाकिस्तान यह भी मानता है कि इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार के तनाव से कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने में मदद मिलेगी।

प्रारम्भ में इसे घुसपैठ मान लिया था और दावा किया गया कि इन्हें कुछ ही दिनों में बाहर कर दिया जाएगा। लेकिन नियंत्रण रेखा में खोज के बाद और इन घुसपैठियों के नियोजित रणनीति में अंतर का पता चलने के बाद भारतीय सेना को अहसास हो गया कि हमले की योजना बहुत बड़े पैमाने पर किया गया है। इसके बाद भारत सरकार ने ऑपरेशन विजय नाम से 2,00,000 सैनिकों को भेजा। यह युद्ध आधिकारिक रूप से 26 जुलाई 1999 को समाप्त हुआ। इस युद्ध के दौरान 550 सैनिकों ने अपने जीवन का बलिदान दिया और 1400 के करीब घायल हुए थे ।

 "२६ जुलाई २०१४ को इंडिया गेट पर स्थित अमर जवान ज्योति पर कारगिल की पंद्रहवी वर्षगांठ मनाई गई।"


कारगिलयुद्ध के नायकों की kकहानियां :

कारगिल में बर्फीले पहाड़ की चोटियां। शत्रु घात लगाए बैठा था। लगभग 1800 फुट ऊपर पहाड़ियों में छिपा दुश्मन भारतीय जांबाजों को रोकने की हर संभव कोशिश कर रहा था। लेकिन हमारे जांबाज प्राणों की परवाह किए बिना बढ़ते रहे। अपनी बहादुरी का परचम दिखाते हुए दुश्मानों को पीठ दिखाकर भागने पर मजबूर कर दिया। कारगिल पर फतह हासिल कर दुनाया को संदेश दिया कि हमसे टकराने वाले मिट्टी में मिल जाएंगे। वर्ष 1999 के उस रण में राजधानी के कई जांबाज शहीद हुए। उन्होंने देश की रक्षा में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। 

सिर में लगी गोली भी कैप्टन मनोज पाण्डेय को न डिगा सकी
कारगिल की जब्बार पहाड़ी पर कब्जा, बटालिक सेक्टर से घुसपैठियों को खदेड़ने व कई अन्य आपरेशन को सफलता पूर्वक अंजाम पहुंचाने के बाद कैप्टन मनोज पाण्डेय को खालुबार पर विजय हासिल करने की जिम्मेदारी दी गई। वर्ष 1999 में 2/3 जुलाई की रात धावा बोलकर दुश्मनों के दो ठिकानों को ध्वस्त कर दिया। तीसरे ठिकाने को नष्ट करते समय उनका कंधा व पैर जख्मी हो गया। जख्मों की परवाह किए बिना अपने साथियों के साथ उन्होंने चौथे ठिकाने पर धावा बोल दिया। तभी दुश्मनों की एक गोली उनके सिर को भेदते हुए पार निकल गई। इसके बावजूद उन्होंने अनन्य साहस दिखाते हुए ग्रेनेड से हमला कर चौथा ठिकाना भी नष्ट कर दिया और खालुबार पर कब्जा कर लिया। इस पराक्रम में बुरी तरह घायल हो गए और 3 जुलाई को ही वह वीरगति को प्राप्त हो गए।

कारगिल में बर्फीले पहाड़ की चोटियां। शत्रु घात लगाए बैठा था। लगभग 1800 फुट ऊपर पहाड़ियों में छिपा दुश्मन भारतीय जांबाजों को रोकने की हर संभव कोशिश कर रहा था। लेकिन हमारे जांबाज प्राणों की परवाह किए बिना बढ़ते रहे। अपनी बहादुरी का परचम दिखाते हुए दुश्मानों को पीठ दिखाकर भागने पर मजबूर कर दिया। कारगिल पर फतह हासिल कर दुनाया को संदेश दिया कि हमसे टकराने वाले मिट्टी में मिल जाएंगे। वर्ष 1999 के उस रण में राजधानी के कई जांबाज शहीद हुए। उन्होंने देश की रक्षा में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। 

सिर में लगी गोली भी कैप्टन मनोज पाण्डेय को न डिगा सकी
कारगिल की जब्बार पहाड़ी पर कब्जा, बटालिक सेक्टर से घुसपैठियों को खदेड़ने व कई अन्य आपरेशन को सफलता पूर्वक अंजाम पहुंचाने के बाद कैप्टन मनोज पाण्डेय को खालुबार पर विजय हासिल करने की जिम्मेदारी दी गई। वर्ष 1999 में 2/3 जुलाई की रात धावा बोलकर दुश्मनों के दो ठिकानों को ध्वस्त कर दिया। तीसरे ठिकाने को नष्ट करते समय उनका कंधा व पैर जख्मी हो गया। जख्मों की परवाह किए बिना अपने साथियों के साथ उन्होंने चौथे ठिकाने पर धावा बोल दिया। तभी दुश्मनों की एक गोली उनके सिर को भेदते हुए पार निकल गई। इसके बावजूद उन्होंने अनन्य साहस दिखाते हुए ग्रेनेड से हमला कर चौथा ठिकाना भी नष्ट कर दिया और खालुबार पर कब्जा कर लिया। इस पराक्रम में बुरी तरह घायल हो गए और 3 जुलाई को ही वह वीरगति को प्राप्त हो गए।

सुनील जंग को बचपन से दुश्मनों से लोहा लेने का शौक था
गोरखा रेजीमेंट में राइफलमैन सुनील जंग को दुश्मनों से लोहा लेने का शौक बचपन से था। वर्ष 1995 में मात्र 16 वर्ष की उम्र में वह सेना में भर्ती हो गए। जज्बे के कारण ट्रेनिंग के दौरान कई मेडल जीता। छुट्टयों में घर आने पर मां से कहता था कि वहां रोज बम गिरता है। बहुत मजा आता है। ऐसा लगता है जैसे हर दिन दीवाली हो। मई 1999 में सुनील व उसके रीजीमेंट को कारगिल सेक्टर में पहुंचने का अदेश मिला। सुनील व उसके साथियों ने डटकर दुश्मनों का मुकाबला किया। सुनील ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए एक-एक करके दुश्मनों पर 25 बम फोड़े जिससे दुश्मनों के हौसले पस्त हो गए। इस दौरान एक गोली सुनील जंग के चेहरे पर लगी जो सिर को पार करते हुए निकल गई। बचपन का सपना पूरा करते हुए वह 15 मई को शहीद हो गए।

घायल होने के बाद भी मेजर रितेश शर्मा ने दुश्मनों से मोर्चा लिया
बचपन से सेना में जाने को इच्छुक मेजर रितेश शर्मा ने वर्ष 1995 में कमीशन प्राप्त किया। उन्हें मई 1999 में कारगिल के मश्कोह घाटी से दुश्मनों को भगाने का आदेश मिला। उन्होंने अपनी यूनिट 17 जाट बटालियन के साथ भीषण हमला करके घुसपैठियों को मार भगाया और चोटी पर कब्जा कर लिया। इस सफलता पर उनकी यूनिट को मश्कोह रक्षक की उपाधि दी गई। इस दौरान सात जुलाई को वह घायल हो गए थे। जख्मों की परवाह किए बिना दस दिन बाद ही वह फिर युद्ध में शामिल हो गए। कश्मीर के कुपावाड़ा सेक्टर में कई आतंकवादियों व घुसपैठियों को मार गिराया। 25 सितम्बर को वह जख्मी होकर 200 मीटर गहरी खाई में गिर गए। उन्हें सेना के उत्तरी कमान अस्पताल में भर्ती कराया गया। लगातार 11 दिनों तक मृत्यु से संघर्ष किया। उन्होंने 6 अक्टूबर 1999 को वीरगति प्राप्त किया।

कारगिल विजय दिवस
हर साल कारगिल युद्ध के नायकों के सम्मान में 26 जुलाई मनाया जाता है ll




Saturday, July 4, 2020

स्वामी विवेकानंद एक भारतीय हिन्दू सन्यासी व महान दार्शनिक

स्वामी विवेकानन्द (जन्म: 12 जनवरी,१८६३ - मृत्यु: ४ जुलाई,१९०२) वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् १८९३ में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें 2 मिनट का समय दिया गया था लेकिन उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत "मेरे अमरीकी भाइयो एवं बहनो" के साथ करने के लिये जाना जाता है। उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था। स्वामी विवेकानन्द जन्म नरेन्द्रनाथ दत्त 12 जनवरी 1863 कलकत्ता (अब कोलकाता) मृत्यु : 4 जुलाई 1902 (उम्र 39) बेलूर मठ, बंगाल रियासत, ब्रिटिश राज (अब बेलूर, पश्चिम बंगाल में) गुरु/शिक्षक रामकृष्ण परमहंस दर्शन आधुनिक वेदांत,राज योग साहित्यिक कार्य राज योग (पुस्तक) कथन:("उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये") हस्ताक्षर धर्म: हिन्दू दर्शन: आधुनिक वेदांत, राज योआधुनिक वेदांत, राज योग राष्ट्रीयता:भारतीय स्वामी विवेकानन्द कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली कायस्थपरिवार में जन्मे विवेकानंद आध्यात्मिकता की ओर झुके हुए थे। वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से काफी प्रभावित थे जिनसे उन्होंने सीखा कि सारे जीवो मे स्वयं परमात्मा का ही अस्तित्व हैं; इसलिए मानव जाति अथेअथ जो मनुष्य दूसरे जरूरत मंदो मदद करता है या सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है। रामकृष्ण की मृत्यु के बाद विवेकानंद ने बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा किया और ब्रिटिश भारत में मौजूदा स्थितियों का प्रत्यक्ष ज्ञान हासिल किया। बाद में विश्व धर्म संसद 1893 में भारत का प्रतिनिधित्व करने, संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए प्रस्थान किया। विवेकानंद ने संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में हिंदू दर्शन के सिद्धांतों का प्रसार किया और कई सार्वजनिक और निजी व्याख्यानों का आयोजन किया। भारत में विवेकानंद को एक देशभक्त संन्यासी के रूप में माना जाता है और उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। महान व्यक्तित्व के थे स्वामीजी। कहानियाँ : लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना संपादित करें एक बार स्वामी विवेकानंद जी अपने आश्रम में सो रहे थे। कि तभी एक व्यक्ति उनके पास आया जो कि बहुत दुखी था और आते ही स्वामी विवेकानंद जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला महाराज मैं अपने जीवन में खूब मेहनत करता हूँ हर काम खूब मन लगाकर भी करता हूँ फिर भी आज तक मैं कभी सफल व्यक्ति नहीं बन पाया। उस व्यक्ति कि बाते सुनकर स्वामी विवेकानंद ने कहा ठीक है। आप मेरे इस पालतू कुत्ते को थोड़ी देर तक घुमाकर लाये तब तक आपके समस्या का समाधान ढूँढ़ता हूँ इतना कहने के बाद वह व्यक्ति कुत्ते को घुमाने के लिए चल गया। और फिर कुछ समय बीतने के बाद वह व्यक्ति वापस आया। तो स्वामी विवेकानंद जी ने उस व्यक्ति से पूछ की यह कुत्ता इतना हाँफ क्यों रहा है। जबकि तुम थोड़े से भी थके हुए नहीं लग रहे हो आखिर ऐसा क्या हुआ ? इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि मैं तो सीधा अपने रास्ते पर चल रहा था जबकि यह कुत्ता इधर उधर रास्ते भर भागता रहा और कुछ भी देखता तो उधर ही दौड़ जाता था. जिसके कारण यह इतना थक गया है । इसपर स्वामी विवेकानंद जी मुस्कुराते हुए कहा बस यही तुम्हारे प्रश्नों का जवाब है. तुम्हारी सफलता की मंजिल तो तुम्हारे सामने ही होती है. लेकिन तुम अपने मंजिल के बजाय इधर उधर भागते हो जिससे तुम अपने जीवन में कभी सफल नही हो पाए. यह बात सुनकर उस व्यक्ति को समझ में आ गया था। की यदि सफल होना है तो हमे अपने मंज़िल पर ध्यान देना चाहिए। कहानी से शिक्षा स्वामी विवेकानंद जी के इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है की हमें जो करना है। जो कुछ भी बनना है। हम उस पर ध्यान नहीं देते है , और दूसरों को देखकर वैसा ही हम करने लगते है। जिसके कारण हम अपने सफलता के मंज़िल के पास होते हुए दूर भटक जाते है। इसीलिए अगर जीवन में सफल होना है ! तो हमेशा हमें अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए !। नारी का सम्मान संपादित करें स्वामी विवेकानंद जी की ख्याति देश – विदेश में फैली हुई थी। एक बार कि बात है। विवेकानंद जी समारोह के लिए विदेश गए थे। और उनके समारोह में बहुत से विदेशी लोग आये हुए थे ! उनके द्वारा दिए गए स्पीच से एक विदेशी महिला बहुत ही प्रभावित हुईं। और वह विवेकानंद जी के पास आयी और स्वामी विवेकानंद से बोली कि मैं आपसे शादी करना चाहती हुँ ताकि आपके जैसा ही मुझे गौरवशाली पुत्र की प्राप्ति हो। इसपर स्वामी विवेकानंद जी बोले कि क्या आप जानती है। कि ” मै एक सन्यासी हूँ ” भला मै कैसे शादी कर सकता हूँ अगर आप चाहो तो मुझे आप अपना पुत्र बना लो। इससे मेरा सन्यास भी नही टूटेगा और आपको मेरे जैसा पुत्र भी मिल जाएगा। यह बात सुनते ही वह विदेशी महिला स्वामी विवेकानंद जी के चरणों में गिर पड़ी और बोली कि आप धन्य है। आप ईश्वर के समान है ! जो किसी भी परिस्थिति में अपने धर्म के मार्ग से विचलित नहीं होते है। कहानी से शिक्षा स्वामी विवेकानंद के इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि सच्चा पुरुष वही होता है जो हर परिस्थिति में नारी का सम्मान करे — प्रारम्भिक जीवन :( 1863-88) स्वामी विवेकानन्द का जन्म १२ जनवरी सन् १८६३ (विद्वानों के अनुसार मकर संक्रान्ति संवत् १९२०)[5] को कलकत्ता में एक कायस्थपरिवार में हुआ था। उनके बचपन का घर का नाम वीरेश्वर रखा गया[6], किन्तु उनका औपचारिक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था।[7] पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे।[8][9] दुर्गाचरण दत्ता, (नरेंद्र के दादा) संस्कृत और फारसी के विद्वान थे उन्होंने अपने परिवार को 25 की उम्र में छोड़ दिया और एक साधु बन गए।[10] उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं।[10]उनका अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था। नरेंद्र के पिता और उनकी माँ के धार्मिक, प्रगतिशील व तर्कसंगत रवैया ने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार देने में मदद की।[11][12] माँ भुवनेश्वरी देवी (1841-1911) का एक चित्र बचपन से ही नरेन्द्र अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि के तो थे ही नटखट भी थे। अपने साथी बच्चों के साथ वे खूब शरारत करते और मौका मिलने पर अपने अध्यापकों के साथ भी शरारत करने से नहीं चूकते थे। उनके घर में नियमपूर्वक रोज पूजा-पाठ होता था धार्मिक प्रवृत्ति की होने के कारण माता भुवनेश्वरी देवी को पुराण,रामायण, महाभारत आदि की कथा सुनने का बहुत शौक था।[12] कथावाचक बराबर इनके घर आते रहते थे। नियमित रूप से भजन-कीर्तन भी होता रहता था। परिवार के धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण के प्रभाव से बालक नरेन्द्र के मन में बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के संस्कार गहरे होते गये। माता-पिता के संस्कारों और धार्मिक वातावरण के कारण बालक के मन में बचपन से ही ईश्वर को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा दिखायी देने लगी थी। ईश्वर के बारे में जानने की उत्सुकता में कभी-कभी वे ऐसे प्रश्न पूछ बैठते थे कि इनके माता-पिता और कथावाचक पण्डितजी तक चक्कर में पड़ जाते थे।[13] शिक्षा : सन् 1871 में, आठ साल की उम्र में, नरेंद्रनाथ ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में दाखिला लिया जहाँ वे स्कूल गए।[14] 1877 में उनका परिवार रायपुर चला गया। 1879 में, कलकत्ता में अपने परिवार की वापसी के बाद, वह एकमात्र छात्र थे जिन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में प्रथम डिवीजन अंक प्राप्त किये।[15] वे दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य सहित विषयों के एक उत्साही पाठक थे।[16] इनकी वेद, उपनिषद, भगवद् गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों के अतिरिक्त अनेक हिन्दू शास्त्रों में गहन रूचि थी। नरेंद्र को भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किया गया था,[17]और ये नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम में व खेलों में भाग लिया करते थे। नरेंद्र ने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन जनरल असेंबली इंस्टिटूशन (अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज) में किया।[18] 1881 में इन्होंने ललित कला की परीक्षा उत्तीर्ण की, और 1884 में कला स्नातक की डिग्री पूरी कर ली।[19][20] नरेंद्र ने डेविड ह्यूम, इमैनुएल कांट, जोहान गोटलिब फिच, बारूक स्पिनोज़ा, जोर्ज डब्लू एच हेजेल, आर्थर स्कूपइन्हार , ऑगस्ट कॉम्टे, जॉन स्टुअर्ट मिल और चार्ल्स डार्विन के कामों का अध्ययन किया।[21][22] उन्होंने स्पेंसर की किताब एजुकेशन (1860) का बंगाली में अनुवाद किया। [23][24] ये हर्बर्ट स्पेंसर के विकासवाद से काफी मोहित थे।[25] पश्चिम दार्शनिकों के अध्यन के साथ ही इन्होंने संस्कृत ग्रंथों और बंगाली साहित्य को भी सीखा।[22] विलियम हेस्टी (महासभा संस्था के प्रिंसिपल) ने लिखा, "नरेंद्र वास्तव में एक जीनियस है। मैंने काफी विस्तृत और बड़े इलाकों में यात्रा की है लेकिन उनकी जैसी प्रतिभा वाला का एक भी बालक कहीं नहीं देखा यहाँ तक की जर्मन विश्वविद्यालयों के दार्शनिक छात्रों में भी नहीं।" अनेक बार इन्हें श्रुतिधर( विलक्षण स्मृति वाला एक व्यक्ति) भी कहा गया है। आध्यात्मिक शिक्षुता - ब्रह्म समाज का प्रभाव संपादित करें 1880 में नरेंद्र, ईसाई से हिन्दू धर्म में रामकृष्ण के प्रभाव से परिवर्तित केशव चंद्र सेन की नव विधान में शामिल हुए, नरेंद्र 1884 से पहले कुछ बिंदु पर, एक फ्री मसोनरी लॉज और साधारण ब्रह्म समाज जो ब्रह्म समाज का ही एक अलग गुट था और जो केशव चंद्र सेन और देवेंद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में था। 1881-1884 के दौरान ये सेन्स बैंड ऑफ़ होप में भी सक्रीय रहे जो धूम्रपान और शराब पीने से युवाओं को हतोत्साहित करता था। यह नरेंद्र के परिवेश के कारण पश्चिमी आध्यात्मिकता के साथ परिचित हो गया था। उनके प्रारंभिक विश्वासों को ब्रह्म समाज ने जो एक निराकार ईश्वर में विश्वास और मूर्ति पूजा का प्रतिवाद करता था, ने प्रभावित किया और सुव्यवस्थित, युक्तिसंगत, अद्वैतवादी अवधारणाओं , धर्मशास्त्र ,वेदांत और उपनिषदों के एक चयनात्मक और आधुनिक ढंग से अध्यन पर प्रोत्साहित किया। स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन संपादित करें उठो जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता। हर आत्मा ईश्वर से जुड़ी है, करना ये है कि हम इसकी दिव्यता को पहचाने अपने आप को अंदर या बाहर से सुधारकर। कर्म, पूजा, अंतर मन या जीवन दर्शन इनमें से किसी एक या सब से ऐसा किया जा सकता है और फिर अपने आपको खोल दें। यही सभी धर्मो का सारांश है। मंदिर, परंपराएं , किताबें या पढ़ाई ये सब इससे कम महत्वपूर्ण है। एक विचार लें और इसे ही अपनी जिंदगी का एकमात्र विचार बना लें। इसी विचार के बारे में सोचे, सपना देखे और इसी विचार पर जिएं। आपके मस्तिष्क , दिमाग और रगों में यही एक विचार भर जाए। यही सफलता का रास्ता है। इसी तरह से बड़े बड़े आध्यात्मिक धर्म पुरुष बनते हैं। एक समय में एक काम करो और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकि सब कुछ भूल जाओ पहले हर अच्छी बात का मजाक बनता है फिर विरोध होता है और फिर उसे स्वीकार लिया जाता है। एक अच्छे चरित्र का निर्माण हजारो बार ठोकर खाने के बाद ही होता है। जीवन में ज्यादा रिश्ते होना जरुरी नहीं लेकिन रिश्तो में जीवन होना बहुत जरुरी है। महत्त्वपूर्ण तिथियाँ संपादित करें 12 जनवरी 1863 -- कलकत्ता में जन्म 1879 -- प्रेसीडेंसी कॉलेज कलकत्ता में प्रवेश 1880 -- जनरल असेम्बली इंस्टीट्यूशन में प्रवेश नवम्बर 1881 -- रामकृष्ण परमहंस से प्रथम भेंट 1882-86 -- रामकृष्ण परमहंस से सम्बद्ध 1884 -- स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण; पिता का स्वर्गवास 1885 -- रामकृष्ण परमहंस की अन्तिम बीमारी 16 अगस्त 1886 -- रामकृष्ण परमहंस का निधन 1886 -- वराहनगर मठ की स्थापना अन्य सन्यासियों के साथ स्वामी विवेकानन्द ( १८८७ , बड़ानगर ) जनवरी 1887 -- वड़ानगर मठ में औपचारिक सन्यास 1890-93 -- परिव्राजक के रूप में भारत-भ्रमण 25 दिसम्बर 1892 -- कन्याकुमारी में 13 फ़रवरी 1893 -- प्रथम सार्वजनिक व्याख्यान सिकन्दराबाद में 31 मई 1893 -- मुम्बई से अमरीका रवाना 25 जुलाई 1893 -- वैंकूवर, कनाडा पहुँचे 30 जुलाई 1893 -- शिकागो आगमन अगस्त 1893 -- हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रो॰ जॉन राइट से भेंट 11 सितम्बर 1893 -- विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में प्रथम व्याख्यान 27 सितम्बर 1893 -- विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में अन्तिम व्याख्यान 16 मई 1894 -- हार्वर्ड विश्वविद्यालय में संभाषण नवंबर 1894 -- न्यूयॉर्क में वेदान्त समिति की स्थापना जनवरी 1895 -- न्यूयॉर्क में धार्मिक कक्षाओं का संचालन आरम्भ अगस्त 1895 -- पेरिस में अक्टूबर 1895 -- लन्दन में व्याख्यान 6 दिसम्बर 1895 -- वापस न्यूयॉर्क 22-25 मार्च 1896 -- फिर लन्दन मई-जुलाई 1896 -- हार्वर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान 15 अप्रैल 1896 -- वापस लन्दन मई-जुलाई 1896 -- लंदन में धार्मिक कक्षाएँ 28 मई 1896 -- ऑक्सफोर्ड में मैक्समूलर से भेंट 30 दिसम्बर 1896 -- नेपाल से भारत की ओर रवाना 15 जनवरी 1897 -- कोलम्बो, श्रीलंका आगमन जनवरी, 1897 -- रामनाथपुरम् (रामेश्वरम) में जोरदार स्वागत एवं भाषण 6-15 फ़रवरी 1897 -- मद्रास में 19 फ़रवरी 1897 -- कलकत्ता आगमन 1 मई 1897 -- रामकृष्ण मिशन की स्थापना मई-दिसम्बर 1897 -- उत्तर भारत की यात्रा जनवरी 1898 -- कलकत्ता वापसी 19 मार्च 1899 -- मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना 20 जून 1899 -- पश्चिमी देशों की दूसरी यात्रा 31 जुलाई 1899 -- न्यूयॉर्क आगमन 22 फ़रवरी 1900 -- सैन फ्रांसिस्को में वेदान्त समिति की स्थापना जून 1900 -- न्यूयॉर्क में अन्तिम कक्षा 26 जुलाई 1900 -- योरोप रवाना 24 अक्टूबर 1900 -- विएना, हंगरी, कुस्तुनतुनिया, ग्रीस, मिस्र आदि देशों की यात्रा 26 नवम्बर 1900 -- भारत रवाना 9 दिसम्बर 1900 -- बेलूर मठ आगमन 10 जनवरी 1901 -- मायावती की यात्रा मार्च-मई 1901 -- पूर्वी बंगाल और असम की तीर्थयात्रा जनवरी-फरवरी 1902 -- बोध गया और वाराणसी की यात्रा मार्च 1902 -- बेलूर मठ में वापसी 4 जुलाई 1902 -- महासमाधि

Monday, June 29, 2020

बाबा नागार्जुन : 26 जनवरी 15 अगस्त

नागार्जुन (11 जून 1911- 5 नवम्बर 1998) हिन्दी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि थे। अनेक भाषाओं के ज्ञाता तथा प्रगतिशील विचारधारा के साहित्यकार नागार्जुन ने हिन्दी के अतिरिक्त मैथिली संस्कृत एवं बाङ्ला में मौलिक रचनाएँ भी कीं तथा संस्कृत, मैथिली एवं बाङ्ला से अनुवाद कार्य भी किया। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित नागार्जुन ने मैथिली में यात्री उपनाम से लिखा तथा यह उपनाम उनके मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र के साथ मिलकर एकमेक हो गया। कविता : 26 जनवरी 15 अगस्त किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है ? कौन यहाँ सुखी है ? कौन यहाँ मस्त है ? सेठ है, शोषक है, नामी गला काटू है गालियाँ भी सुनता है भारी थूक चाटू है चोर है डाकू है, झूठा-मक्कार है कातिल है छलिया है, लुच्चा-लबार है जैसे भी टिकट मिला जहाँ भी टिकट मिला शासन के घोड़े पर वो ही सवार है उसी की जनवरी, उसी का अगस्त है बाकी सब दुखी हैं बाकी सब पस्त हैं…. कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है कौन है बुलन्द आज, कौन आज त्रस्त है खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा मालिक बुलन्द है, कुली-मजूर त्रस्त है गुंडों की चौकड़ी है, गुंडा ही मस्त है उन्हीं की जनवरी उन्हीं का अगस्त है गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी गिन लो बुधुआ के पास अभी कितना कबाड़ है महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है गरीबों की बस्ती में उखाड़ है पछाड़ है धत तेरी, धत तेरी, कुच्छो नहीं कुच्छो नहीं बस ताड़ का तिल है, तिल का ही ताड़ है ताड़ के पत्ते हैं, पत्तों के पंखे हैं पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है और इसी आड़ में भाषण के झाड़ में जादुई आँकड़े हैं, बजट का पहाड़ है किसकी जनवरी है, किसका अगस्त है ? कौन यहाँ सुखी है, कौन यहाँ मस्त है सेठ है सुखी और सेठ ही मस्त है मंत्री है सुखी और मंत्री ही मस्त है उसी की जनवरी, उसी का अगस्त है – बाबा नागार्जुन

Thursday, June 18, 2020

लघुकथा : एहसास

आज लघुकथा दिवस की बहुत बधाई l मैं कोई रचनाकर नहीं हूँ बस लिखने पढ़ने की अभिलाषा रहती है पेश है मेरी एक लघुकथा एहसास लघुकथा का हो रायसाहब कैसे है आप आज कल? ई लॉक डाउनवा मे छुप छुपाकर थोड़ा गप्पे लड़ाने आए है आप ही से l का बताए गुप्ता जी ई कोरों- नवाँ मिले तो ससुरे को भरपेट मारे l पूरे दुनिया को नाक मे दम करके रखा है ई कोरोंनवाँ l झुंझलाते हुए रायसाहब ने अपनी खीज व्यक्त किया l का हुआ राय साहब एतना गुस्सा काहे कर रहे हैं? हमीं लोग का भलाई के लिए सरकार ने लॉक डाउन किया है न! सब्र रखिए सब ठीक हो जाएगा l खाक ठीक हो जाएगा! सावधानी से जायदा लापरवाही बरती जा रही है l ई कारण न जाने कब तक ई घरवा मे कैद रहना पड़ेगा l कोई अता - पता ना है हो गुप्ता जी l दम घुट रहा है घर में, चिड़चिड़ा गया है मन l अरे राय साहब आपको घर में काहें को घुटन हो रहा है मर्दे! आप तो पक्षियों के पालने के बड़ा शौकीन है l बुध्दिजीवी जानवरों को आज किस बात का घुटन हो रहा है राय साहब l एतना सुनकर सुनकर मानो साँप सूँघ गया हो l उनकी आँखों की नमी मानो पछतावा के साक्ष्य है और चेहरे पर अफसोस की साफ झलक थीं l नाम जितेन्द्र कुमार गुप्ता पिता हरिद्वार प्रसाद गुप्ता घर - अररिया आर ऐस, अररिया, बिहार Jitendrathejitu@gmail.com

वीर सैनिकों पर कविता

कब तक हमारे जवान शहीद होते रहेंगे, कब तक अमरो की सुची में एक और नाम जुड़ते रहेंगे, आखिर कब तक जांबाज, शेर वीर जवानों को खोकर, उन्हें अमर कहते रहेंगे, कब तक ऐसे ही दिल को दिलाशा देते रहेंगे, बस अब और नहीं अटल फैसला लेना होगा, हाय तौबा हाय तौबा से उपर उठकर, बाप को बेटे का कान पकड़कर, उसकी गलती का एहसास दिलाना होगा, फिर भी न माने तो, ऐसे कुपुत्र को करारा सबक सिखाना होगा, गलती से बाज़ नहीं आए तो, दिल पर पत्थर रखकर इसे मिटाना होगा, बारंबार गलती अपराध बन जाता है, तब अपराधी को माफी नहीं, कठोर दंड दिया जाता है, ऐसे में दूजा अपराधी अपराध करने से डर जाता है। आंतकी का हल , न बातचीत न युद्ध विराम से होगा, छलियां है ये , कायरता, क्रुरता रग-रग में है इनका ढूंढ़ों इनको इनके घर में और आंतक लीला समाप्त करों, शेर की तरह दहाड़ों और चूहे की जमात समाप्त करों,। एक के बदले दस नहीं सौ शीश काट लाओ, आंतक क्या हैं, आंतकी इससे रु ब रु हो जाएंगे, हिमाकत नहीं होगी फिर से आंख दिखाने की, जब इन्हीं के घर में इनकी औकात बतलाएंगे, तब बड़ी अदब से अब्बा जान कहकर, जलपान के लिए बुलाएंगे, हम भी सारे गिले-शिकवे भुलाकर गले लगाएंगे ll मुर्झाई सी कली पुनः खिल जाएगी विश्व को आंतक से छुटकारा मिल जाएगा चाहूं ओर शांति होगी भारत पुनः विश्व गुरु बन जाएगा ll रचनाकार जितेन्द्र कुमार गुप्ता कृपया प्रतिक्रिया करना न भूले l

सुशांत सिंह राजपूत कविता #ripshushantsir

जिंदादिली से हँसना - मुस्कुराना हार जीत की फिक्र छोड़ तेरा जीने की अंदाज सीखाना जिंदगी में important kuchh भी नहीं जिंदगी के अलावे हो ग़र परेशां तो खुद की हत्या कायरता है कोई solution नहीं, छिछोरे बन जिंदगी आसाना बनाना करोड़ों के बुझे हुए मन में उम्मीदों की लौ जलाना ये तेरे ही सारे सीख तू ही कैसे भूल गया l यार! सुशांत ऐसे भी जाता है क्या कोई? जैसे तू गया ll हार न मानने वाला सुशांत कैसे ग़ज़ भर रस्सी से जिंदगी की जंग हार गया ll जिसने दी फ़िल्मों से सीख जहां को वो क्यों आख़िर कैसे टूट गया ll कामयाबी हाथों में थीं शोहरत की सेहरा माथे पर थी फिर ऐसी क्या बात हुई? दुनिया ऊब कर जीवन की डोर छोड़ चला शायद अपनों से दिल की बात न हुई घुट घुट कर जीने से बेहतर उसे मौत लगी ll धोका दे गया सरफराज वफा सिखाकर छोड़ गया! किरदारों से लाखो को अपना बनाकर यूँ भी रोना अभिनय में कहां आसान यारों हँस लेना कभी ग़मों को छिपाकर ll जिंदगी से बेहतर सुशांत को मौत लगी चार दीवारों के बीच अपनों की कमी बहुत खली वरना मरता कौन हैं शौक से यहाँ फांसी से लटक कर मरना एक बहाना था ll सुशांत, थे तुम क्यों शोर मचा के चले गए जीवन के उथल - पुथल से लड़ना तुम भूल गए जिंदगी के मैदान से जीत छीन लेने वाले ऐसा भी तुझे हुआ क्या? जो फांसी पे झूल गए ll चेहरे पर ग़ज़ब का चमक अंदाज ए बयां बेहतरीन चला गया सबको सिखाकर एक सबक कि भले ही कदमों में बुलंदियां मगर एक अदद दोस्त रखा कर जब भी हो कोई परेशानियाँ चाय की घुट के साथ उस से बेझिझक बतियाया कर ll क्योंकि तन्हाई मे जीने की तमन्नाये खत्म हो जाया करती है बाते करना सीख लो खुलकर यारों से वर्ना न जाने कब जिन्दगी ही मौत बन जाया करती है l ये तुमने ठीक नहीं किया मन व्याकुल अशांत हैं बाते कर लेते रूठे यारो से तुम ठहरे बिहार ए शान सुशांत थे l कवि :Jk gupta (youtuber begana bol jk gupta) jitendrathejitu@gmail.com

Friday, June 5, 2020

पर्यावरण दिवस पर कविता poem on environment

1.पेड़ मेरी टहनियां मत काटो छिन जाएगी खुशियां मेरी मेरी अस्तित्व मिटी अगर तेरी अस्तित्व भी मिट जाएगी ll मत तोड़ो मेरे फूलों को छिन जाएगी मेरी आभा मिट्टी ने ही पाला मुझको मिट्टी ही मेरा घरौंदा ll तुम मत हरों हरियाली मेरी जग बेरंग हो जाएगी, काटोगे जो मेरी बाहों को मैं अपंग हो जाऊँगा ll कहने दो बाबा को किस्से चहचहाने दो चूडियों को नीड़ बनाने दो इन्हें मेरी ममता की गोद में खेलने दो, झूलने दो बच्चों को झुला बैठने दो बटोही को नीम की छांव में ll काटते रहे यदि यू ही मुझको कितनी खुशियां लूट जाएगी मैं तो चुप रह जाऊँगा प्रकृति चुप न रह पाएगी ll इतिहास ने भी द्रौपदी का वस्त्र हरा था तो विध्वंस हुआ था कुरुक्षेत्र में आज भी मानवता हार चुकी है अब सीखो इतिहास के पन्नों से सुनो गौर से प्रलय की आहट मिल चुकी है l 2. नदियाँ संघर्ष कर दुःख उठाकर असहनीय पीड़ा सहकर कभी संकरी कभी विशाल रूप धरकर पहाड़ों से बहकर आयी हूँ, इस धरा पर ll जल ही जीवन है बस य़ह कहने भर हैं II कहकर य़ह इंसान बना दिया है मुझे एक कूड़ेदान ll खैर! प्रकृति की लॉक डाउन मुझे कर दिया है स्वच्छ, शुद्ध और स्वस्थ अब टूट चुका हैं मानव का अभिमान डर - डर कर बह रहीं हूँ कहीं फिर न बन जाऊँ कूड़ेदान ll 3. इंसान यूँ आँखे 👁 बंद ये चुप होना कान भी बंद तमाशा देख और मौन होना प्रकृति की दोहन कर तेरा खुश होना ll समाप्त कर देगा सब कुछ समतल हो जाएगी सारी धरा l नृशंस मासूम जीवों की हत्या नीचता की हदें पार इंसानियत की भाषा भूल इतनी जहालियत अब और कितना अपराध बहुत हुआ बस छिन लेगी प्रकृति, इंसान होने का अधिकार ला खड़ा करेगी मानवों को अब अपनी कठघरे में न कोई सुनवाई, न पछतायावा के आंसू सिर्फ होगा अंतिम फ़ैसला और देगी कठोर सजा l नाम जितेन्द्र कुमार गुप्ता

डेली करेंट अफेयर्स 2022 (Daily Current Affairs 20 JUNE 2022) : IMPORTANT QUESTIONS WITH ANSWER FOR PREPRATION OF GOVERMENTp JOB

 डेली करेंट अफेयर्स 2022 (Daily Current Affairs 20 JUNE 2022) : IMPORTANT QUESTIONS WITH ANSWER FOR PREPRATION OF GOVERMENT दोस्तों जैसा की ...